शनिवार, 6 सितंबर 2014

आत्मबोध और समूह

सामान्य जीवनयापन में प्रत्येक मनुष्य अपने उपलब्ध जीवन स्तर के अनुरूप अपना कोई सामाजिक रूप स्थिर कर अपने व्यक्तित्व को प्रगट करता है और एक सामाजिक सुरक्षा आहरित करता है । ऐसा करने में उसका अपना पूर्ण विकास अभी षेस रहता है । पूर्णविकास तभी सम्भव होता है जब वह अपने अंदर विद्यमान ब्रम्ह के अंश आत्मा का अनुभव कर जीवन को ब्रम्ह के प्रतिनिधि के रूप में पर्णित करता है । ऐसा करने में वह समूह से कट अवश्य जाता है परंतु उसका उदय एक उच्चस्तरीय व्यक्तित्व के रूप में होता है जो कि समस्त मानवसमाज़ के प्रति प्रेम और सेवा के रूप में प्रकाशित होता है । इस उपलब्धि के व्यक्ति की दृढता आत्मचेतना के साथ कोई समझौता नहीं करने देती है । आत्मबोध उसकी सर्वाधिक प्रिय धरोहर हो जाती है ।  

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