जीव का स्वरूप अपरिवर्तनीय ब्रम्ह के अंदर गति के
समान होता है । जब तक आत्मा मैं-नहीं प्रकृति के साथ सम्बंध के परिचय से जाना जाता
है वह बंधन में रहता है । परंतु, जब विवेक के प्रभाव से आत्मा और प्रकृति का सत्य
स्वरूप विदित हो जाता है और जब प्रकृति निर्मित शरीर पूर्णरूप से आत्मा के प्रकाश
से प्रकाशित हो जाती है तब आत्मा मुक्त हो जाती है । यह उपलब्धि विवेक के समुचित
प्रयोग द्वारा ही सम्भव हो सकती है । यही मनुष्य के विज्ञान श्रेणी का आधार है
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