बुधवार, 17 सितंबर 2014

वाँक्षित

दो भिन्न अवयव, विषय और वस्तु । प्रत्येक मनुष्य की रचना में यह दोनो ही विद्यमान हैं । विषय आत्मा । वस्तु प्रकृति । प्रकृति निर्भर करती है बाह्य शक्तियों पर जिनका उद्भव शून्य से होता है । आत्मा अंश होता है परम् सत्य ब्रम्ह का इसलिये किसी अन्य पर निर्भर नहीं होता है । इसलिये विषय स्वरूप का वस्तु स्वरूप के ऊपर वर्चस्व होना वाँक्षित होता है । अहंकार विषय स्वरूप को परिसीमन करने के तुल्य होता है । इसलिये त्याज्य होता है । 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें