दो भिन्न अवयव, विषय और वस्तु । प्रत्येक मनुष्य की रचना में यह दोनो ही विद्यमान हैं । विषय
– आत्मा । वस्तु – प्रकृति । प्रकृति निर्भर करती है बाह्य शक्तियों पर जिनका उद्भव शून्य से
होता है । आत्मा अंश होता है परम् सत्य ब्रम्ह का इसलिये किसी अन्य पर निर्भर नहीं
होता है । इसलिये विषय स्वरूप का वस्तु स्वरूप के ऊपर वर्चस्व होना वाँक्षित होता
है । अहंकार विषय स्वरूप को परिसीमन करने के तुल्य होता है । इसलिये त्याज्य होता
है ।
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