जिस प्रकार प्रकृति के संसर्ग में
रहकर आत्मा प्रकृतीय गुणों और ईंद्रीय वासनाओं के भोग की कामना करने लगता है उसी
प्रकार प्रकृति को भी आत्मा के गुणों के रंग में रंगा जा सकता है । अंतर यह है कि
पहली प्रक्रिया अर्थात् आत्मा का प्रकृतीय गुणों से प्रभावित होना आम दिनचर्या में
बिना किसी प्रयत्न के घटित होने का क्रम मानो पूर्व निर्धारित प्रक्रिया है ।
परंतु प्रकृति को आत्मा के गुणों से ओतप्रोत बनाना विषेस प्रयत्नों से उपलब्ध होने
वाली प्रक्रिया है । जब किसी मनुष्य की प्रकृति आत्ममय हो जाये तो मुक्त आनंद उसकी
चिर धरोहर बन जायेगा ।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें