शुक्रवार, 12 सितंबर 2014

आत्ममय प्रकृति

जिस प्रकार प्रकृति के संसर्ग में रहकर आत्मा प्रकृतीय गुणों और ईंद्रीय वासनाओं के भोग की कामना करने लगता है उसी प्रकार प्रकृति को भी आत्मा के गुणों के रंग में रंगा जा सकता है । अंतर यह है कि पहली प्रक्रिया अर्थात् आत्मा का प्रकृतीय गुणों से प्रभावित होना आम दिनचर्या में बिना किसी प्रयत्न के घटित होने का क्रम मानो पूर्व निर्धारित प्रक्रिया है । परंतु प्रकृति को आत्मा के गुणों से ओतप्रोत बनाना विषेस प्रयत्नों से उपलब्ध होने वाली प्रक्रिया है । जब किसी मनुष्य की प्रकृति आत्ममय हो जाये तो मुक्त आनंद उसकी चिर धरोहर बन जायेगा । 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें