सोमवार, 8 सितंबर 2014

आत्मस्वरूप चरण 2

अविभाज्य ब्रम्ह ने अपने को समय के साथ विनाश होने वाली शरीर में सीमित बौद्धिक क्षमता के परिवेश में रखा है । किसी भी मनुष्य का जीवन पूर्णरूप से दूसरे किसी अन्य मनुष्य के जीवन से एक जैसा नहीं होता है । किसी भी मनुष्य के जीवन में घटित होने वाली घटनायें किसी अन्य दूसरे मनुष्य के जीवनमें घटित होने वाली घटनाओं के पूर्ण तारतम्य में नहीं होती हैं । इन भिन्नताओं के सत्य होते हुये भी प्रत्येक मनुष्य के जीवन का सामान्य ढाँचा एक जैसा ही होता है । यह उभयनिष्ठ ब्रम्ह के अंश आत्मा की उपस्थिति का फल होता है ।  

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