अविभाज्य ब्रम्ह ने अपने को समय के
साथ विनाश होने वाली शरीर में सीमित बौद्धिक क्षमता के परिवेश में रखा है । किसी
भी मनुष्य का जीवन पूर्णरूप से दूसरे किसी अन्य मनुष्य के जीवन से एक जैसा नहीं होता है । किसी भी मनुष्य के जीवन
में घटित होने वाली घटनायें किसी अन्य दूसरे मनुष्य के जीवनमें घटित होने वाली
घटनाओं के पूर्ण तारतम्य में नहीं होती हैं । इन भिन्नताओं के सत्य
होते हुये भी प्रत्येक मनुष्य के जीवन का सामान्य ढाँचा एक जैसा ही होता है । यह
उभयनिष्ठ ब्रम्ह के अंश आत्मा की उपस्थिति का फल होता है ।
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