मुक्ति अथवा बंधन यह मात्र मनुष्य
के लिये विचारणीय हैं । ब्रम्ह किसी भी द्वैत से परे होने के कारण मुक्ति अथवा
बंधन से प्रभावित नहीं हो सकता । मनुष्य से नीचे की श्रेणियाँ पशु व वनस्पति के
लिये भी यह विचारणीय नहीं होता । यह विचार विवेक की उपस्थिति से ही सम्भव होता है
जो कि पशु और वनस्पति को मिला नहीं है । योगेश्वर श्रीकृष्ण ने मोंहाशक्त अर्जुन
को समस्त जीवन-दर्शन बताने के उपरांत अपनाने हेतु योग्य पथ को चुनने को कहा ।
आत्मा को प्रकृतीय गुणों के साथ चिन्हित कराना अथवा आत्मा को ब्रम्ह की गरिमा के
अनुरूप मर्यादित रखना यह प्रत्येक मनुष्य का अपना चुनाव है । यह चुनाव विवेक
द्वारा ही सम्भव है ।
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