कर्म सिद्धांत के अनुसार समस्त
कर्मों की कर्ता प्रकृति होती है । इसलिये प्रेरक आत्मा यदि कंचिद उन्ही कर्मों को
प्रेरित करती है जो कि प्रकृति द्वारा किये जा रहे हैं तो ऐसी दशा में आत्मा सही
कर रही होती है । आत्मा की इस स्थिति को पाने के लिये यह अनिवार्य वाँक्षना होती
है कि वह प्रकृतीय मोंहसे मुक्त होवे । अन्यथा की दशा में आत्मा अपनी आसक्ति के
अनुसार इच्छाजनित कर्मों को प्रेरित करने को उद्यत होगी जो कि उसके लिये दोषपूर्ण
कहा जावेगा । आत्मा की मुक्ति दशा पाने के लिये योगावस्था में कार्यों को करने का
अभ्यास सहायक होगा ।
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