जब मनुष्य अपने आत्मा को ईंद्रीय
वासनाओं में लिप्त होने तथा प्रकृतीय गुणों में आसक्त होने से रोकने में सफल हो
जाता है तब आत्मा अपने सात्विक स्वभाव में उसके विवेक में प्रगट होती है । विवेक
के आत्मप्रकाशित होने पर मनुष्य प्रकृति की बंधन लीला से मुक्त हो जाता है । आत्मा
की सृजनात्मक प्रेरण क्षमता का सत्य स्वरूप उदय होता है । मनुष्य प्रकृति के हाथों
में एक असहाय खिलौना नहीं रह जाता है । इस लोक में रहते हुये वह उच्चतर लोक का
आनंदभोग करता है ।
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