सोमवार, 15 सितंबर 2014

आत्मसंयम

जब मनुष्य अपने आत्मा को ईंद्रीय वासनाओं में लिप्त होने तथा प्रकृतीय गुणों में आसक्त होने से रोकने में सफल हो जाता है तब आत्मा अपने सात्विक स्वभाव में उसके विवेक में प्रगट होती है । विवेक के आत्मप्रकाशित होने पर मनुष्य प्रकृति की बंधन लीला से मुक्त हो जाता है । आत्मा की सृजनात्मक प्रेरण क्षमता का सत्य स्वरूप उदय होता है । मनुष्य प्रकृति के हाथों में एक असहाय खिलौना नहीं रह जाता है । इस लोक में रहते हुये वह उच्चतर लोक का आनंदभोग करता है । 

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