मंगलवार, 30 सितंबर 2014

सामान्य प्रवृत्ति

प्रत्येक मनुष्य के जीवन में नित्य नयीं स्थितियाँ उसके सामने उपस्थित होती हैं । उसकी आत्मा प्रत्येक स्थल पर परिवर्तनों को तलाशता है । वह खोज़ने की कोशिश करता है कि जो कुछ भी उसे ज्ञात है उसकी अपेक्षा नयी परिस्थिति में क्या कुछ बदला हुआ है । यह निर्णय कर पाना ही सबसे अहम् स्थल होता है कि क्या प्रकृति प्रेरित है और क्या उसकी स्वयँ की इच्छा के प्रतिफल से है । कोई भी मनुष्य पूर्ण नहीं हो सकता है । परंतु अच्छे के लिये प्रयत्न करने वाले की उपलब्धि उसे विलक्षण बनाती है । 

सोमवार, 29 सितंबर 2014

वाँक्षित

जल में रहिये परंतु जल से प्रभावित ना होइये । आत्मा प्रकृति के मध्य रहते हुये प्रकृति से प्रभावित ना होवें । यह अपेक्षा है । इसे कितना सत्य कौन कर सकता है । इस उपलब्धि से ही समस्त अंतर होंगे । प्रकृति से प्रभावित आत्मा प्रकृति की दासता करेगी । प्रकृति से ना प्रभावित आत्मा स्वतंत्रता का आनंद भोग करेगी । चुनाव प्रत्येक के अपने विवेक के अधीन होता है । 

रविवार, 28 सितंबर 2014

फलों का भोक्ता

प्रकृति के तीन गुण । तमस्, राज़स्, सात्विक । इन गुणो के अधीन किये गये कार्यों के फल की अनुभूति मनुष्य शरीर में आत्मा करता है । यह उसका स्वाभाविक धर्म है । परंतु जब इन भुक्त फलों की कामना आत्मा में व्याप्त हो जाती है तो वह आत्मा का अपने धर्म से विचलन है । विवेक की आवश्यकता इसी स्थल पर होती है आत्मा को विचलन से रक्षित करने में उपयोग । आत्मा ना ही इंद्रियों द्वारा ज्ञेय है और ना ही इंद्रियों द्वारा नियंत्रण ही सम्भव है । कर्मों का संचालन विवेक के द्वारा संयमित करना ही एकमात्र उपाय होता है ।  

शनिवार, 27 सितंबर 2014

आत्मा का सत्य स्वरूप

आत्मा परम् ब्रम्ह का ही अंश है । परंतु कंचिद जब यह अपने को एक अलग अस्तित्व के रूप में प्रस्तुत करने को उद्यत हो जाती है तो इस स्थिति को ही अहंकार बताया जाता है । यह अवाँक्षित स्थिति होति है । आत्मा को ब्रम्ह ने प्रकृति के मध्य रखा है अपने प्रतिनिधि के रूप में ऐसे में आत्मा को कंचिद अलग अस्तित्व के रूप में अपने को प्रस्तुत करने की चेष्टा अ-मर्यादित प्रयत्न है । इसे हर प्रकार शमन करना ही सार्थक आचरण है । आत्मा का सत्य स्वरूप ब्रम्ह के प्रतिनिधि के रूप में है । 

शुक्रवार, 26 सितंबर 2014

मोंह से आसक्त कर्म

प्रकृति के तीन गुण । तमस, रजस, सात्विक । तीनो ही बंधन प्रशस्थ करने वाले हैं । एक कर्म के परिणाम से सृजित होने वाला दूसरा कर्म । बंधन । होना क्या चाहिये ? मुक्ति । एक कर्म किया । वह वहीं पूर्ण । मुक्ति । यह समस्त आत्मा की यथा स्थिति के फल द्वारा उत्पन्न होने वाली स्थितियाँ हैं । मोंहाशक्त आत्मा प्रेरित करेगी बंधनकारी कर्म । मोंह से मुक्त आत्मा प्रेरित करेगी मुक्ति दायक कर्म । आत्मा की मुक्त स्थिति पाने के लिये एक प्रारम्भिक प्रयत्न के रूप में मनुष्य को अपने अंदर विद्यमान तमस् और रज़स को सात्विक के द्वारा विजय करना चाहिये । यह सात्विक स्थिति भी बंधनकारी है । मात्र तमस् और रज़स की तुलना में बेहतर है । इसलिये तमस् और रज़स के नियंत्रण के उपरांत इसे भी त्यागना होगा । स्वतंत्र आत्मा से ब्रम्ह की ओर अग्रसर हो सकेंगे । 

गुरुवार, 25 सितंबर 2014

आत्मा का विक्षेप

आत्मा ब्रम्ह का अंश होने के नाते अभेद्य है । परंतु जब यह स्वयँ प्रकृतीय मोंह में संलग्न हो जाती है तो यह इसका स्वयँ अपना ही विचलन है । इस विचलन के लिये बाह्य परिस्थितियाँ मात्र निमित्त हैं कारण नहीं । इसलिये इस विक्षेप से बचने के लिये स्वयँ आत्मा को ही सतर्क रहना ही उपाय है । यहीं विवेक की भूमिका होती है । आत्मा कार्यों की प्रेरक होती है । इसलिये कार्यों को योगावस्था में करना आत्मा को सम्भावित विक्षेप से मुक्ति दिलाना है । 

बुधवार, 24 सितंबर 2014

पुनर्जन्म

इस शरीर की रचना दो भिन्न प्रकार के अवयवों के सन्योग से सम्भव हुई है । एक प्रकृति निर्मित भाग है जो कि मृत्यु को प्राप्त होता है । दूसरा अविनाशी ब्रम्ह का अंश है जो कि अज़र और अमर होता है । यह भाग मृत्यु से प्रभावित नहीं होता है । प्रथम भाग के मृत्यु के समय यह दूसरा भाग ब्रम्ह के विशिष्ट विज्ञान द्वारा दूसरी शरीर में अंतरित किया जाता है । पुनर्जन्म का सिद्धांत व्यक्त करता है कि किसी भी शरीर में भोग करती आत्मा द्वारा क्रियांवित किये गये कार्यों का अंकन आत्मा के साथ रहता है और उन्ही कर्मों के फल भोगने हेतु ही उसे नयी शरीर आवंटित होती है । 

मंगलवार, 23 सितंबर 2014

कर्म द्वारा मुक्ति

कर्म सिद्धांत के अनुसार समस्त कर्मों की कर्ता प्रकृति होती है । इसलिये प्रेरक आत्मा यदि कंचिद उन्ही कर्मों को प्रेरित करती है जो कि प्रकृति द्वारा किये जा रहे हैं तो ऐसी दशा में आत्मा सही कर रही होती है । आत्मा की इस स्थिति को पाने के लिये यह अनिवार्य वाँक्षना होती है कि वह प्रकृतीय मोंहसे मुक्त होवे । अन्यथा की दशा में आत्मा अपनी आसक्ति के अनुसार इच्छाजनित कर्मों को प्रेरित करने को उद्यत होगी जो कि उसके लिये दोषपूर्ण कहा जावेगा । आत्मा की मुक्ति दशा पाने के लिये योगावस्था में कार्यों को करने का अभ्यास सहायक होगा ।  

सोमवार, 22 सितंबर 2014

कर्म मात्र परिस्थिति

आत्मबोध तदोपरांत आत्मा का ब्रम्ह में विलय की स्थिति पाने के लिये कर्म करने की एक निश्चित विधि मात्र वह परिस्थिति है जिसमें कर्म का प्रयत्न करने से लक्ष्य प्राप्त होता है । कर्म किसी भी भाँति अंतिम लक्ष्य नहीं हो सकता है । कर्म का प्रेरक आत्मा एक निश्चित अनुशासन के अंतर्गत सम्पादन करने की दशा में ही स्वतंत्र स्थिति में रह सकता है । स्वतंत्र आत्मा ही ब्रम्ह की ओर उन्मुख हो सकती है । कर्म कुछ प्रकृति नियंत्रित होते हैं और शेस अपने वश के होते हैं । 

रविवार, 21 सितंबर 2014

आत्मा का विक्षेप

ब्रम्ह किसी को अच्छा या बुरा चुनने के लिये बाध्य नहीं करता है । यह प्रत्येक मनुष्य का अपना विवेक निर्धारित करता है । जो मनुष्य दृढता से अच्छा पथ चुनता है उसी की आत्मा प्रकृति के मोंह से मुक्त हो पाती है । रचयिता ब्रम्ह ने प्रत्येक मनुष्य को बनाया इसी निमित्त से है कि वह ब्रम्ह के कार्यों को ब्रम्ह की अपेक्षानुसार यथासमय करे । यदि मनुष्य इस अपेक्षा के विपरीत प्रकृतीय मोंह के वशीभूत इच्छाजनित कार्यों को करता है तो यह स्थिति उसकी आत्मा के विक्षेप का द्योतक होती है । 

शनिवार, 20 सितंबर 2014

कर्म प्रेरक

कर्म सिद्धांत के अनुरूप कर्म प्रेरण आत्मा उसी दशा में कर सकती है जबकि आत्मा प्रकृतीय मोंह से मुक्त दशा में होगी । कर्म सिद्धांत के अनुसार कर्मों की कर्ता प्रकृति को बताया गया है । आत्मा का प्रकृति के प्रति मोंह उसे परवशता की दशा प्रदान करता है । आत्मा की प्रकृतीय मोंह से मुक्ति उसकी स्वतंत्रता है जो कि उसे अपने परम् पिता तुल्य ब्रम्ह की ओर बढने का आधार प्रदान करने वाली दशा है । 

शुक्रवार, 19 सितंबर 2014

माया का मोंह

मनुष्य प्रकृति के संसार में जीवन जीते हुये प्रकृतीय मोंह में बँधा रहता है । अपनी आत्मा की पहचान बिस्मृत कर वह माया के मोंह में फँसा रहता है । इस मोंह को त्यागने पर ही अपने अंदर विद्यमान ब्रम्ह के अंश आत्मा की अनुभूति सम्भव होती है । बिजातीय के प्रति आकर्षण ही बंधन होता है । जिस पल मनुष्य इस बंधन को काट कर अपने को मुक्त कर लेगा उसका अपना शरीर ही ब्रम्ह के प्रतिनिधि के स्वरूप में पर्णित हो जावेगा ।   

गुरुवार, 18 सितंबर 2014

परवशता / स्वतंत्रता

प्रकृति का प्रत्येक प्रेरण अन्य शक्तियों से सम्भव होता है । शक्तियाँ भौगोलिक, जीव विज्ञान, वंशपरम्परा, व सामाजिक । प्रकृति के कार्य को करने के लिये उसे किसी बाह्य श्रोत की आवश्यकता होती है । यह परवशता है । इसके विपरीत आत्मा में सृजनात्मक क्षमता होती है । यह स्वयं सक्षम होता है । यह स्वतंत्रता है । कर्म का सिद्धांत प्रकृति के क्षेत्र में प्रभावी होता है । कर्म-सिद्धांत के अनुसार कर्ता प्रकृति होती है । स्वतंत्र आत्मा मात्र प्रकृति के आदेशित कार्यों का प्रेरक बनकर आदर्श जीवन प्रशस्थ करता है ।  

बुधवार, 17 सितंबर 2014

वाँक्षित

दो भिन्न अवयव, विषय और वस्तु । प्रत्येक मनुष्य की रचना में यह दोनो ही विद्यमान हैं । विषय आत्मा । वस्तु प्रकृति । प्रकृति निर्भर करती है बाह्य शक्तियों पर जिनका उद्भव शून्य से होता है । आत्मा अंश होता है परम् सत्य ब्रम्ह का इसलिये किसी अन्य पर निर्भर नहीं होता है । इसलिये विषय स्वरूप का वस्तु स्वरूप के ऊपर वर्चस्व होना वाँक्षित होता है । अहंकार विषय स्वरूप को परिसीमन करने के तुल्य होता है । इसलिये त्याज्य होता है । 

मंगलवार, 16 सितंबर 2014

परवशता / स्वतंत्रता

प्रकृति का प्रत्येक प्रेरण अन्य शक्तियों से सम्भव होता है । शक्तियाँ भौगोलिक, जीव विज्ञान, वंशपरम्परा, व सामाजिक । प्रकृति के कार्य को करने के लिये उसे किसी बाह्य श्रोत की आवश्यकता होती है । यह परवशता है । इसके विपरीत आत्मा में सृजनात्मक क्षमता होती है । यह स्वयं सक्षम होता है । यह स्वतंत्रता है । कर्म का सिद्धांत प्रकृति के क्षेत्र में प्रभावी होता है । कर्म-सिद्धांत के अनुसार कर्ता प्रकृति होती है । स्वतंत्र आत्मा मात्र प्रकृति के आदेशित कार्यों का प्रेरक बनकर आदर्श जीवन प्रशस्थ करता है ।  

सोमवार, 15 सितंबर 2014

आत्मसंयम

जब मनुष्य अपने आत्मा को ईंद्रीय वासनाओं में लिप्त होने तथा प्रकृतीय गुणों में आसक्त होने से रोकने में सफल हो जाता है तब आत्मा अपने सात्विक स्वभाव में उसके विवेक में प्रगट होती है । विवेक के आत्मप्रकाशित होने पर मनुष्य प्रकृति की बंधन लीला से मुक्त हो जाता है । आत्मा की सृजनात्मक प्रेरण क्षमता का सत्य स्वरूप उदय होता है । मनुष्य प्रकृति के हाथों में एक असहाय खिलौना नहीं रह जाता है । इस लोक में रहते हुये वह उच्चतर लोक का आनंदभोग करता है । 

रविवार, 14 सितंबर 2014

मैं और मैं-नहीं का भेद

मनुष्य शरीर में पदार्थ की ज़डता, बनस्पतियों की व्यवस्था, बुद्धिधारको की पशुता तथा मनुष्य का विवेक एवं सर्वोपरि ब्रम्ह का अंश यह सभी विद्यमान पाये जाते हैं । प्रश्न यह होता है कि कौन मनुष्य अपना परिचय किस स्तर के साथ प्रगट करता है । जो मनुष्य ब्रम्ह के अंश आत्मा को अपना परिचय बनाता है वह स्वतंत्र आनंद की स्थिति भोग करता है । जो अपने को प्रकृति के साथ परिचित कराता है वह आवश्यकताओं और आभाव से ग्रसित जीवन जीता है । मुख्य विचार यह है कि कौन कितना मैं ( ब्रम्ह ) और मैं-नहीं ( प्रकृति ) को जान सका है । जानने के उपरांत कितना अपने विवेक का उपयोग कर सही का चुनाव कर सका है । 

शनिवार, 13 सितंबर 2014

चुनाव / विवेक

मुक्ति अथवा बंधन यह मात्र मनुष्य के लिये विचारणीय हैं । ब्रम्ह किसी भी द्वैत से परे होने के कारण मुक्ति अथवा बंधन से प्रभावित नहीं हो सकता । मनुष्य से नीचे की श्रेणियाँ पशु व वनस्पति के लिये भी यह विचारणीय नहीं होता । यह विचार विवेक की उपस्थिति से ही सम्भव होता है जो कि पशु और वनस्पति को मिला नहीं है । योगेश्वर श्रीकृष्ण ने मोंहाशक्त अर्जुन को समस्त जीवन-दर्शन बताने के उपरांत अपनाने हेतु योग्य पथ को चुनने को कहा । आत्मा को प्रकृतीय गुणों के साथ चिन्हित कराना अथवा आत्मा को ब्रम्ह की गरिमा के अनुरूप मर्यादित रखना यह प्रत्येक मनुष्य का अपना चुनाव है । यह चुनाव विवेक द्वारा ही सम्भव है । 

शुक्रवार, 12 सितंबर 2014

आत्ममय प्रकृति

जिस प्रकार प्रकृति के संसर्ग में रहकर आत्मा प्रकृतीय गुणों और ईंद्रीय वासनाओं के भोग की कामना करने लगता है उसी प्रकार प्रकृति को भी आत्मा के गुणों के रंग में रंगा जा सकता है । अंतर यह है कि पहली प्रक्रिया अर्थात् आत्मा का प्रकृतीय गुणों से प्रभावित होना आम दिनचर्या में बिना किसी प्रयत्न के घटित होने का क्रम मानो पूर्व निर्धारित प्रक्रिया है । परंतु प्रकृति को आत्मा के गुणों से ओतप्रोत बनाना विषेस प्रयत्नों से उपलब्ध होने वाली प्रक्रिया है । जब किसी मनुष्य की प्रकृति आत्ममय हो जाये तो मुक्त आनंद उसकी चिर धरोहर बन जायेगा । 

गुरुवार, 11 सितंबर 2014

मुक्ति और बंधन

आत्मा जब अपने को प्रकृति के साथ चिन्हित करती है तो वह बंधन में है । जब आत्मा अपने को प्रकृति से अछूता रखती है तो वह मुक्त है । बंधन इच्छाओं का संसार है । मुक्ति स्वतंत्रता का संसार है । यद्यपि कि आत्मा और प्रकृति पूर्णरूप से भिन्न घटक हैं फिरभी साथ संसर्ग में रहकर एक दूसरे को प्रभावित करते हैं । ईंद्रीय वासनाओं के भोग की कामना । प्रकृतीय घटको के स्वामित्व की कामना । यह सब इच्छालोक है । जो प्रकृति करावे वह करना, जो कुछ प्रकृति दे उसमें संतुष्ट रहना स्वतंत्रता का लोक है ।  

बुधवार, 10 सितंबर 2014

आत्मस्वरूप चरण 4

जीव का स्वरूप अपरिवर्तनीय ब्रम्ह के अंदर गति के समान होता है । जब तक आत्मा मैं-नहीं प्रकृति के साथ सम्बंध के परिचय से जाना जाता है वह बंधन में रहता है । परंतु, जब विवेक के प्रभाव से आत्मा और प्रकृति का सत्य स्वरूप विदित हो जाता है और जब प्रकृति निर्मित शरीर पूर्णरूप से आत्मा के प्रकाश से प्रकाशित हो जाती है तब आत्मा मुक्त हो जाती है । यह उपलब्धि विवेक के समुचित प्रयोग द्वारा ही सम्भव हो सकती है । यही मनुष्य के विज्ञान श्रेणी का आधार है  

मंगलवार, 9 सितंबर 2014

आत्मस्वरूप चरण 3

अहंकार का सार प्रत्येक मनुष्य की पहचान की भिन्नता जिससे प्रत्येक एक भिन्न परिचय से जाना जाता है सृजनात्मक एकता पर आधारित होती है । मानो जीवन का लक्ष्य निर्धारित करने वाला अवयव होता है । यह एक सम्पूर्ण योजना के समान होता है जिसने मनुष्य का शरीर धारण किया है । जैसा लक्ष्य जिसके जीवन का होता है वैसा ही उसके जीवन का स्वरूप होता है । कोई भी रूप जो भी मनुष्य धारण करता है वह उसके अपने ही द्वारा अतिक्रमित भी किया जाता है । यह प्रक्रिया तब तक चलती जाती है जब तक परिवर्तनशील अपरिवर्तनीय तक नहीं पहुँच जाता है । 

सोमवार, 8 सितंबर 2014

आत्मस्वरूप चरण 2

अविभाज्य ब्रम्ह ने अपने को समय के साथ विनाश होने वाली शरीर में सीमित बौद्धिक क्षमता के परिवेश में रखा है । किसी भी मनुष्य का जीवन पूर्णरूप से दूसरे किसी अन्य मनुष्य के जीवन से एक जैसा नहीं होता है । किसी भी मनुष्य के जीवन में घटित होने वाली घटनायें किसी अन्य दूसरे मनुष्य के जीवनमें घटित होने वाली घटनाओं के पूर्ण तारतम्य में नहीं होती हैं । इन भिन्नताओं के सत्य होते हुये भी प्रत्येक मनुष्य के जीवन का सामान्य ढाँचा एक जैसा ही होता है । यह उभयनिष्ठ ब्रम्ह के अंश आत्मा की उपस्थिति का फल होता है ।  

रविवार, 7 सितंबर 2014

आत्मस्वरूप चरण 1

आत्मा परम् सत्य ब्रम्ह का अंश है । ब्रम्ह ने अपनी माया की शक्ति द्वारा अपने को इस रूप में प्रगट किया है । यह ब्रम्ह की बौद्धिक शक्ति का परिणाम है कि अविभाज्य ब्रम्ह ने आत्मा के रूप में अपने अंश को विकीर्त किया है । आत्मा के परिपेक्ष्य में ब्रम्ह इसके पिता के समान हैं । आत्मा की कार्यगुणवत्ता इसके में व्याप्त ब्रम्ह के प्रति भाव में निर्भर करती है । आत्मा की कार्य विशिष्टता (1) इसमें व्याप्त ब्रम्ह के प्रति भाव (2) प्रकृतीय संसर्ग के कारण जनित प्रकृति के गुणों में मोंह के स्तर के आधार पर निर्भर करती है | 

शनिवार, 6 सितंबर 2014

आत्मबोध और समूह

सामान्य जीवनयापन में प्रत्येक मनुष्य अपने उपलब्ध जीवन स्तर के अनुरूप अपना कोई सामाजिक रूप स्थिर कर अपने व्यक्तित्व को प्रगट करता है और एक सामाजिक सुरक्षा आहरित करता है । ऐसा करने में उसका अपना पूर्ण विकास अभी षेस रहता है । पूर्णविकास तभी सम्भव होता है जब वह अपने अंदर विद्यमान ब्रम्ह के अंश आत्मा का अनुभव कर जीवन को ब्रम्ह के प्रतिनिधि के रूप में पर्णित करता है । ऐसा करने में वह समूह से कट अवश्य जाता है परंतु उसका उदय एक उच्चस्तरीय व्यक्तित्व के रूप में होता है जो कि समस्त मानवसमाज़ के प्रति प्रेम और सेवा के रूप में प्रकाशित होता है । इस उपलब्धि के व्यक्ति की दृढता आत्मचेतना के साथ कोई समझौता नहीं करने देती है । आत्मबोध उसकी सर्वाधिक प्रिय धरोहर हो जाती है ।  

शुक्रवार, 5 सितंबर 2014

सत्य स्वरूप

हमारे अंदर प्रकृतीय रचना के प्रत्येक स्तर विद्यमान हैं । पदार्थ की जडता वनस्पति की व्यवस्था एवं बुद्धि श्रेणी की पशुता । परंतु यथार्थ को जानने का विवेक ही हम मनुष्यों को एक विशिष्ट श्रेणी प्रदान करता है । यदि हम सत्य के प्रति अचेत रहते जीवन यापन करते हैं तो यह अपनी विशिष्टता का त्याग करने के तुल्य होगा । सत्य के अनुरूप जीवन का स्वरूप बनाना अपने व्यक्तित्व का पूर्ण विकास करने के समान है । सामाजिक मानको की सीमा में प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन का कोई एक अर्थ धारणकर एक अस्तित्व महसूस करता है । परंतु यह जीवन के पूर्ण विकास को अवरुद्ध करने के समान होता है । जिस पल आप अपने को परम् सत्य के अंश के रूप में उसके प्रतिनिधि बनने का बोध धारण कर जीवन को जीयेंगे जीवन चर्मोत्कर्ष उत्कर्ष तक पहुँचेगा । पूर्ण विकास सम्भव होगा ।  

गुरुवार, 4 सितंबर 2014

अहंकार मात्र भ्रम

यह समस्त सृष्टि ब्रम्ह की अभिव्यक्ति है । ब्रम्ह ही सृजन कर्ता है । ब्रम्ह ही समस्त गतिविधियों का संचालक है । इसके विपरीत स्व का विचार मात्र एक भ्रम ही होता है । स्व का अस्तित्व तथा स्व का विचार मात्र सत्य के विपरीत संघर्ष है । इस सत्य का बोध एवं सत्य के अनुरूप स्व का ब्रम्ह में समर्पण ही अभीष्ट उपलब्धि होती है । इस उपलब्धि के उपरांत कुछ भी हासिल करना शेस नहीं रह जाता है । इस शरीर को एक अलग अस्तित्व के रूप में ग्रहण करना अहंकार है । इसे ब्रम्ह के एक सूक्ष्म अंश के रूप में ब्रम्ह के प्रतिनिधि के रूप में ग्रहण करना ब्रम्ह में विलय है । सत्य स्वरूप है । 

बुधवार, 3 सितंबर 2014

अहंकार का विलय

परमात्मा हमारे अंदर एक प्रकाशपुँज की भाँति उपस्थित रहकर मेरे सकल कमों का प्रत्यक्ष साक्षी है । इसे अलग नहीं किया जा सकता है । इसे क्षतिग्रस्त नहीं किया जा सकता है । मौत इस प्रकृत निर्मित शरीर की होती है । परमात्मा को मौत छू नहीं सकती है । इसे कोई भी विकार ग्रसित नहीं कर सकता है । अपने अंदर विद्यमान इस परमात्मा के स्वरूप को पहचानने के लिये हमें अपने अहंकार को पूर्णतया समाप्त करना होगा । अहंकार के विलय होते ही हमारा जीवन परमात्मा के दिव्य स्वरूप का प्रतीक बन जावेगा ।  

मंगलवार, 2 सितंबर 2014

उत्कर्ष की ओर

प्रकृति हमें वही पथ प्रदान करती है जिससे यात्रा कर हम उस परम् सत्य को हासिल कर सकें । इस काल से बाधित शरीर से हम उस चिर सत्य को प्राप्त हो सकें । इसी प्रकृति निर्मित शरीर के माध्यम से उस दिव्य शांति की स्थिति को प्राप्त कर सकें। अपने इस स्वार्थ पर आधारित विवेक द्वारा हम उस परम् सत्य के प्रयोजन के एक निष्ठावान कर्मी बन सकें । इन सब उत्कर्ष स्थितियों को पाने के लिये हमें मात्र अपने अंदर विद्यमान ब्रम्ह की छवि को पहचानने की अनुभूति करने की आवश्यकता है । इस परिचय के बाद जीवन ब्रम्ह के दिव्य स्वरूप का अंग बन जावेगा ।  

सोमवार, 1 सितंबर 2014

परमात्मा

हम प्रत्येक के अंत:करण में परमात्मा विद्यमान हैं । यह माया का प्रभाव है कि हम सभी प्रकृतीय मोंह में कुछ इस प्रकार तल्लीन हैं कि हम उस परमात्मा की उपस्थिति को अनुभव नहीं कर पाते हैं । हमारे अंदर विद्यमान परमात्मा हमारे प्रत्येक कर्म सम्पादन का साक्षात् साक्षी है । इन्ही बंधनकारी कर्मो के कारण ही हम इस शरीर उस शरीर में जन्म पाते दु:ख संताप झेलते सतत् यात्रा करते चले जा रहे हैं । जिसपल हमें अपनी इच्छाजनित कर्मों को करने की भूल समझ में आ जाती है और हम प्रकृति के आदेशित कर्मों को करने के पथ पर चल पडते हैं तो हमारा उत्तरोत्तर सुधार प्रारम्भ हो जाता है । चर्मोत्कर्ष स्थिति होती है कि हम प्रत्येक पल अपने अंदर विद्यमान परमात्मा की अनुभूति में जीवन जीयें । इसका फल यह होगा कि परमात्मा हमारी शुचिता से संतुष्ट होकर हमें अपने में समाहित कर लेगा ।