परमात्मा हमारे अंदर एक प्रकाशपुँज
की भाँति उपस्थित रहकर मेरे सकल कमों का प्रत्यक्ष साक्षी है । इसे अलग नहीं किया
जा सकता है । इसे क्षतिग्रस्त नहीं किया जा सकता है । मौत इस प्रकृत निर्मित शरीर
की होती है । परमात्मा को मौत छू नहीं सकती है । इसे कोई भी विकार ग्रसित नहीं कर
सकता है । अपने अंदर विद्यमान इस परमात्मा के स्वरूप को पहचानने के लिये हमें अपने
अहंकार को पूर्णतया समाप्त करना होगा । अहंकार के विलय होते ही हमारा जीवन
परमात्मा के दिव्य स्वरूप का प्रतीक बन जावेगा ।
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