मंगलवार, 9 सितंबर 2014

आत्मस्वरूप चरण 3

अहंकार का सार प्रत्येक मनुष्य की पहचान की भिन्नता जिससे प्रत्येक एक भिन्न परिचय से जाना जाता है सृजनात्मक एकता पर आधारित होती है । मानो जीवन का लक्ष्य निर्धारित करने वाला अवयव होता है । यह एक सम्पूर्ण योजना के समान होता है जिसने मनुष्य का शरीर धारण किया है । जैसा लक्ष्य जिसके जीवन का होता है वैसा ही उसके जीवन का स्वरूप होता है । कोई भी रूप जो भी मनुष्य धारण करता है वह उसके अपने ही द्वारा अतिक्रमित भी किया जाता है । यह प्रक्रिया तब तक चलती जाती है जब तक परिवर्तनशील अपरिवर्तनीय तक नहीं पहुँच जाता है । 

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