प्रकृति के तीन गुण । तमस्, राज़स्, सात्विक । इन गुणो के अधीन किये गये कार्यों के फल
की अनुभूति मनुष्य शरीर में आत्मा करता है । यह उसका स्वाभाविक धर्म है । परंतु जब
इन भुक्त फलों की कामना आत्मा में व्याप्त हो जाती है तो वह आत्मा का अपने धर्म से
विचलन है । विवेक की आवश्यकता इसी स्थल पर होती है आत्मा को विचलन से रक्षित करने
में उपयोग । आत्मा ना ही इंद्रियों द्वारा ज्ञेय है और ना ही इंद्रियों द्वारा
नियंत्रण ही सम्भव है । कर्मों का संचालन विवेक के द्वारा संयमित करना ही एकमात्र
उपाय होता है ।
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