जिस व्यक्ति की आत्मा प्रकृति पर
विजय प्राप्त करली है । दूसरे शब्दों में जिस व्यक्ति की स्वतंत्र प्रवृत्ति ने
परवशता पर आधारित एवं परवशता जनित करने वाली वृत्तियों पर विजय प्राप्त करली है ।
ऐसे व्यक्ति के लिये परवशता भी मित्रवत् आचरण करने वाली बन जाती है । परंतु जिस
व्यक्ति की आत्मा परवशता की प्रतीक प्रकृति के मोंह में आसक्त है । उस व्यक्ति के
लिये परवशता शत्रुवत् व्यवहार करने वाली होती है ।
आत्मा
गुरुवार, 16 अक्टूबर 2014
बुधवार, 15 अक्टूबर 2014
आत्मा का उत्थान / पतन
आत्मा ही आत्मा का उत्थान भी करती
है और आत्मा ही आत्मा का पतन भी करती है । आत्मा और परम् सत्य में कोई भेद नहीं
होता है । परंतु जब आत्मा प्रकृतीय मोंह में आसक्त हो जाती है तो भेद सृजित हो
जाता है क्योंकि परम् सत्य पर कभी भी किसी भी दशा में प्रकृति का प्रभाव नहीं पडता
है । प्रकृतीय मोंह के प्रभाव से आत्मा परम् सत्य की अपेक्षा का उलंघन कर अपनी
रुचि के कर्म प्रेरण को उद्यत होती है । यह आत्मा का पतन है । पतन प्रारम्भ हो
जाने पर फिर बढता ही जाता है । मोंह ग्रसित आत्मा कंचिद विवेक के प्रभाव से जब
मोंह से मुक्त होने का प्रयत्न प्रारम्भ करती है तब शनै: शनै: उसका उत्थान होने
लगता है । वह परम् सत्य की प्रतिनिधि बन जाती है । यह आत्मा का उत्थान है ।
मंगलवार, 14 अक्टूबर 2014
कर्म ही परिचय
आत्मा परम् सत्य का अंश होने के
कारण प्रकृति निर्मित इंद्रियों व बुद्धि से जाना नहीं जा सकता है । इसलिये आत्मा
का मोंह में संलग्न होना अथवा मोंह से मुक्त होना उसके द्वारा प्रेरित कर्म की
गुणवत्ता द्वारा ही परीक्षित किया जा सकता है । इस प्रकार कर्म ही मोंहाशक्त आत्मा की मोंह में लिप्तता की परख भी है और आत्मा को मोंह से मुक्त कराने का
उपाय भी है । इन कारणों से सुधार के लिये जिज्ञासु साधक को अपने कर्मों के परख के प्रति
विषेस सतर्कता रखनी चाहिये ।
सोमवार, 13 अक्टूबर 2014
मोंह का नाश
आत्मा का प्रकृतीय मोंह आत्मा की
व्याधि है । यह व्याधी आत्मा की कार्य गुणवत्ता का नाश करने वाली होती है ।
योगावस्था में किये जाने वाले कर्म इस व्याधि का निवारण पथ होता है । मस्तिष्क के
पूर्ण नियंत्रण द्वारा मस्तिष्क की योग की अवस्था पैदा होती है । कर्म संविधान के
प्रति निष्ठा । कर्मों की कर्ता प्रकृति है । यह कर्म संविधान है । इसे स्वीकारना
आत्मा का अभीष्ट होता है । इच्छाओं से आच्छादित आत्मा कर्म संविधान के उलँघन को प्रवृत्त
होती है । मस्तिष्क की योग की दशा इस व्याधि का निवारण पथ्य है ।
रविवार, 12 अक्टूबर 2014
कर्मयोग
मनुष्य शरीर में इंद्रियाँ, मस्तिष्क प्रकृतीय रचना हैं । मस्तिष्क इंद्रियों का नियंत्रक है । इन समस्त
का कार्य आत्मा के प्रेरण पर निर्भर करता है । मस्तिष्क का नियंत्रण योग है ।
आत्मा का प्रकृतीय मोंह आत्मा की व्याधि है । इसप्रकार नियंत्रित मस्तिष्क और
व्याधिरहित आत्मा द्वारा प्रेरण होने की दशा सृजित करेगी कर्मयोग । योग की अवस्था
में किये जाने वाले कर्म । मस्तिष्क की योग की अवस्था । वह अवस्था जिसमें कार्य के
परिणाम से मस्तिष्क प्रभावित ना होवे । योगावस्था के मस्तिष्क का प्रेरण मोंह की
व्याधि से रहित आत्मा द्वारा । कर्मयोग । योगेश्वर श्रीकृष्ण कर्मयोगी थे ।
कर्मयोगी ही युग प्रवर्तक होता है ।
शनिवार, 11 अक्टूबर 2014
क्षेत्रज्ञ
जबतक आत्मा प्रकृतीय मोंह में
आसक्त है वह क्षेत्रज्ञ है । प्रकृति का ज्ञाता है परंतु अपने मूल स्वरूप से च्युत
है । आत्मा का कार्य क्षेत्र प्रकृति है । आत्मा प्रकृति का स्वामी है । परंतु
प्रकृतीय गुणों में आसक्त हो वह स्वामी से दास बन बैठता है । घोर पतन है । फिर भी
सत्य है । यह परम् सत्य की माया की शक्ति है कि स्वामी दास बनता है । इस अचेतन
अवस्था के पराभव का अंत तब तक नहीं सम्भव है जब तक विवेक नहीं जाग्रित होता है ।
कंचिद विवेक जाग्रित हो जाय तो परवशता अवश्य ही स्वतंत्रता में पर्णित होकर रहेगी
। मुक्त आत्मा ही आनंद है । प्रकृतीय मोंहसे मुक्ति ही आनंद का द्वार है ।
शुक्रवार, 10 अक्टूबर 2014
परमात्मा समाहिता
प्रकृतीय मोंह से मुक्त आत्मा
परमात्मा का ही प्रगट रूप बन जाती है । आत्मा और परमात्मा दोनों एक ही हैं ।
भिन्नता उत्पन्न होती है जब आत्मा प्रकृति में लिप्त हो जाती है । आत्मा इच्छाओं
और आभावों से ग्रसित हो जाती है । अपनी प्रभुता खो बैठती है । अद्वैत धर्मदर्शन
बताता है कि आत्मा और परमात्मा एक ही हैं परंतु प्रकृतीय संसर्ग में आत्मा बिना
विचारे प्रकृतीय मोंह में आसक्त हो अपना मूल स्वरूप खो देती है । विवेक के प्रभाव
से जब मनुष्य अपनी भूल महसूस करता हैं और अपने मूल स्वरूप की ओर लौटता है तो वह
पाता है कि परमात्मा तो स्वयँ उसके अंत:करण में विद्यमान है । परमात्मा समाहिता ।
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