गुरुवार, 2 अक्टूबर 2014

चिर ब्रम्ह

अनश्वर ब्रम्ह मनुष्य के अंदर विद्यमान है । उसकी उपस्थिति से ही हम मनुष्य स्वरूप में हैं । परंतु फिरभी हम उसे विस्मृत कर इस नश्वर संसार के रूप लावण्य में उलझे हुये हैं । यह विडम्बना है । यह उस ब्रम्ह की माया का फल है । इस प्रकृतीय मोंह से उबरना होगा । उस ब्रम्ह की अनुभूति कर उसकी गरिमा के अनुरूप जीवन बनाना होगा । उपलब्धि होगी दिव्य आनंद । अंत होगा कलह और अशांति का ।  

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