अनश्वर ब्रम्ह मनुष्य के अंदर
विद्यमान है । उसकी उपस्थिति से ही हम मनुष्य स्वरूप में हैं । परंतु फिरभी हम उसे
विस्मृत कर इस नश्वर संसार के रूप लावण्य में उलझे हुये हैं । यह विडम्बना है । यह
उस ब्रम्ह की माया का फल है । इस प्रकृतीय मोंह से उबरना होगा । उस ब्रम्ह की
अनुभूति कर उसकी गरिमा के अनुरूप जीवन बनाना होगा । उपलब्धि होगी दिव्य आनंद । अंत
होगा कलह और अशांति का ।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें