कर्म प्रेरक आत्मा जब कर्ता
प्रकृति के आदेशों को यंत्रवत् प्रेरित करे तो यह अभीष्ट वाँक्षित स्थिति है ।
आत्मा और प्रकृति पूर्णरूप से भिन्न हैं । मोंह ऐसी शक्ति है जो कि विजातीय के साथ
बाँधती है । मोंह की उपस्थिति से कर्म प्रेरक आत्मा का आचरण कलुषित हो जाता है ।
दागी आत्मा इच्छाजनित कार्यों को करने को उद्यत् होता है । अभीष्ट को पाने तथा
अवाँक्षित से बचने के लिये अपनी आत्मा की अनुभूति प्रथम वाँक्षना है ।
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