प्रकृतीय मोंह से मुक्त आत्मा
परमात्मा का ही प्रगट रूप बन जाती है । आत्मा और परमात्मा दोनों एक ही हैं ।
भिन्नता उत्पन्न होती है जब आत्मा प्रकृति में लिप्त हो जाती है । आत्मा इच्छाओं
और आभावों से ग्रसित हो जाती है । अपनी प्रभुता खो बैठती है । अद्वैत धर्मदर्शन
बताता है कि आत्मा और परमात्मा एक ही हैं परंतु प्रकृतीय संसर्ग में आत्मा बिना
विचारे प्रकृतीय मोंह में आसक्त हो अपना मूल स्वरूप खो देती है । विवेक के प्रभाव
से जब मनुष्य अपनी भूल महसूस करता हैं और अपने मूल स्वरूप की ओर लौटता है तो वह
पाता है कि परमात्मा तो स्वयँ उसके अंत:करण में विद्यमान है । परमात्मा समाहिता ।
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