बुधवार, 15 अक्टूबर 2014

आत्मा का उत्थान / पतन

आत्मा ही आत्मा का उत्थान भी करती है और आत्मा ही आत्मा का पतन भी करती है । आत्मा और परम् सत्य में कोई भेद नहीं होता है । परंतु जब आत्मा प्रकृतीय मोंह में आसक्त हो जाती है तो भेद सृजित हो जाता है क्योंकि परम् सत्य पर कभी भी किसी भी दशा में प्रकृति का प्रभाव नहीं पडता है । प्रकृतीय मोंह के प्रभाव से आत्मा परम् सत्य की अपेक्षा का उलंघन कर अपनी रुचि के कर्म प्रेरण को उद्यत होती है । यह आत्मा का पतन है । पतन प्रारम्भ हो जाने पर फिर बढता ही जाता है । मोंह ग्रसित आत्मा कंचिद विवेक के प्रभाव से जब मोंह से मुक्त होने का प्रयत्न प्रारम्भ करती है तब शनै: शनै: उसका उत्थान होने लगता है । वह परम् सत्य की प्रतिनिधि बन जाती है । यह आत्मा का उत्थान है । 

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