आत्मा की प्रधानता का जीवनयापन
करने को उद्यत होने पर प्रत्येक के मस्तिष्क में एक स्वाभाविक संशय जागृत होता है
कि अभी तक तो हम अपने लाभ हानि के आधार पर कार्य करते थे और अब यदि इस आधार को
त्याग हम प्रकृति की अपेक्षानुसार कार्य करें तो कहीं हम दोनों से ही ना जाँय ।
लाभ की रक्षा भी ना कर सकें और प्रकृति की अपेक्षा के कृत का तो क्या परिणाम होगा
पता ही नहीं । परंतु योगेश्वर श्रीकृष्ण ने बताया कि यह संशय निर्मूल है क्योंकि
यह मेरा न्याय है कि ब्रम्ह की अपेक्षानुसार किया गया कोई भी प्रयत्न किसी भी दशा
में नष्ट नहीं हो सकता है ।
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