आत्मा परम् सत्य का अंश होने के
कारण प्रकृति निर्मित इंद्रियों व बुद्धि से जाना नहीं जा सकता है । इसलिये आत्मा
का मोंह में संलग्न होना अथवा मोंह से मुक्त होना उसके द्वारा प्रेरित कर्म की
गुणवत्ता द्वारा ही परीक्षित किया जा सकता है । इस प्रकार कर्म ही मोंहाशक्त आत्मा की मोंह में लिप्तता की परख भी है और आत्मा को मोंह से मुक्त कराने का
उपाय भी है । इन कारणों से सुधार के लिये जिज्ञासु साधक को अपने कर्मों के परख के प्रति
विषेस सतर्कता रखनी चाहिये ।
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