बुधवार, 8 अक्टूबर 2014

निराशी अपरिग्रह

इच्छाओं से मुक्त निराशी । प्रकृतीय घटको के स्वामित्व की कामना से मुक्त अपरिग्रह: । इच्छा व उसकी पूर्ति के यत्न आत्मबोध के प्रयत्नों में बाधक होते हैं । इसी प्रकार प्रकृतीय घटको के स्वामित्व की कामना और इस कामना की पूर्ति मे किये जाने वाले यत्न आत्मबोध के प्रयत्नों में बाधक होते हैं । सत्य आनंद हमारे अंत:करण में निहित है । इसे बाह्य जगत में खोज़ने का यत्न निरर्थक है । परम् सत्य हमारे अंत:करण में विद्यमान है । हम माया लोक में उलझे उसे अनुभूति नहीं कर पाते हैं । 

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