जबतक आत्मा प्रकृतीय मोंह में
आसक्त है वह क्षेत्रज्ञ है । प्रकृति का ज्ञाता है परंतु अपने मूल स्वरूप से च्युत
है । आत्मा का कार्य क्षेत्र प्रकृति है । आत्मा प्रकृति का स्वामी है । परंतु
प्रकृतीय गुणों में आसक्त हो वह स्वामी से दास बन बैठता है । घोर पतन है । फिर भी
सत्य है । यह परम् सत्य की माया की शक्ति है कि स्वामी दास बनता है । इस अचेतन
अवस्था के पराभव का अंत तब तक नहीं सम्भव है जब तक विवेक नहीं जाग्रित होता है ।
कंचिद विवेक जाग्रित हो जाय तो परवशता अवश्य ही स्वतंत्रता में पर्णित होकर रहेगी
। मुक्त आत्मा ही आनंद है । प्रकृतीय मोंहसे मुक्ति ही आनंद का द्वार है ।
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