मनुष्य को ब्रम्ह ने कर्म करने के
लिये ही बनाया है । कर्म विदित रूप से प्रकृति निर्मित शरीर द्वारा सम्पन्न होता
है । परंतु कोई भी कर्म बिना आत्मा के सन्युक्त हुये नही सम्भव होता है । सृष्टि
की रचना में निहित विज्ञान के इस अंश को जब भी मनुष्य समझ जाता है तभी वह अपनी
आत्मा की शुचिता के लिये जिज्ञासु बनता है । आत्मा समस्त कर्मों का आधार है जिसकी
कर्ता प्रकृति है ।
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