हमारे अंदर प्रकृतीय रचना के
प्रत्येक स्तर विद्यमान हैं । पदार्थ की जडता वनस्पति की व्यवस्था एवं बुद्धि
श्रेणी की पशुता । परंतु यथार्थ को जानने का विवेक ही हम मनुष्यों को एक विशिष्ट
श्रेणी प्रदान करता है । यदि हम सत्य के प्रति अचेत रहते जीवन यापन करते हैं तो यह
अपनी विशिष्टता का त्याग करने के तुल्य होगा । सत्य के अनुरूप जीवन का स्वरूप
बनाना अपने व्यक्तित्व का पूर्ण विकास करने के समान है । सामाजिक मानको की सीमा
में प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन का कोई एक अर्थ धारणकर एक अस्तित्व महसूस करता है
। परंतु यह जीवन के पूर्ण विकास को अवरुद्ध करने के समान होता है । जिस पल आप अपने
को परम् सत्य के अंश के रूप में उसके प्रतिनिधि बनने का बोध धारण कर जीवन को
जीयेंगे जीवन चर्मोत्कर्ष उत्कर्ष तक पहुँचेगा । पूर्ण विकास सम्भव होगा ।
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