मनुष्य शरीर में पदार्थ की ज़डता, बनस्पतियों की व्यवस्था, बुद्धिधारको की पशुता तथा मनुष्य का विवेक एवं
सर्वोपरि ब्रम्ह का अंश यह सभी विद्यमान पाये जाते हैं । प्रश्न यह होता है कि कौन
मनुष्य अपना परिचय किस स्तर के साथ प्रगट करता है । जो मनुष्य ब्रम्ह के अंश आत्मा
को अपना परिचय बनाता है वह स्वतंत्र आनंद की स्थिति भोग करता है । जो अपने को
प्रकृति के साथ परिचित कराता है वह आवश्यकताओं और आभाव से ग्रसित जीवन जीता है ।
मुख्य विचार यह है कि कौन कितना मैं ( ब्रम्ह ) और मैं-नहीं ( प्रकृति ) को जान
सका है । जानने के उपरांत कितना अपने विवेक का उपयोग कर सही का चुनाव कर सका है ।
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