आत्मा ब्रम्ह का अंश होने के नाते
अभेद्य है । परंतु जब यह स्वयँ प्रकृतीय मोंह में संलग्न हो जाती है तो यह इसका
स्वयँ अपना ही विचलन है । इस विचलन के लिये बाह्य परिस्थितियाँ मात्र निमित्त हैं
कारण नहीं । इसलिये इस विक्षेप से बचने के लिये स्वयँ आत्मा को ही सतर्क रहना ही
उपाय है । यहीं विवेक की भूमिका होती है । आत्मा कार्यों की प्रेरक होती है ।
इसलिये कार्यों को योगावस्था में करना आत्मा को सम्भावित विक्षेप से मुक्ति दिलाना
है ।
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