गुरुवार, 25 सितंबर 2014

आत्मा का विक्षेप

आत्मा ब्रम्ह का अंश होने के नाते अभेद्य है । परंतु जब यह स्वयँ प्रकृतीय मोंह में संलग्न हो जाती है तो यह इसका स्वयँ अपना ही विचलन है । इस विचलन के लिये बाह्य परिस्थितियाँ मात्र निमित्त हैं कारण नहीं । इसलिये इस विक्षेप से बचने के लिये स्वयँ आत्मा को ही सतर्क रहना ही उपाय है । यहीं विवेक की भूमिका होती है । आत्मा कार्यों की प्रेरक होती है । इसलिये कार्यों को योगावस्था में करना आत्मा को सम्भावित विक्षेप से मुक्ति दिलाना है । 

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