मनुष्य प्रकृति के संसार में जीवन
जीते हुये प्रकृतीय मोंह में बँधा रहता है । अपनी आत्मा की पहचान बिस्मृत कर वह
माया के मोंह में फँसा रहता है । इस मोंह को त्यागने पर ही अपने अंदर विद्यमान
ब्रम्ह के अंश आत्मा की अनुभूति सम्भव होती है । बिजातीय के प्रति आकर्षण ही बंधन
होता है । जिस पल मनुष्य इस बंधन को काट कर अपने को मुक्त कर लेगा उसका अपना शरीर
ही ब्रम्ह के प्रतिनिधि के स्वरूप में पर्णित हो जावेगा ।
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