यह समस्त सृष्टि ब्रम्ह की
अभिव्यक्ति है । ब्रम्ह ही सृजन कर्ता है । ब्रम्ह ही समस्त गतिविधियों का संचालक
है । इसके विपरीत स्व का विचार मात्र एक भ्रम ही होता है । स्व का अस्तित्व तथा
स्व का विचार मात्र सत्य के विपरीत संघर्ष है । इस सत्य का बोध एवं सत्य के अनुरूप
स्व का ब्रम्ह में समर्पण ही अभीष्ट उपलब्धि होती है । इस उपलब्धि के उपरांत कुछ
भी हासिल करना शेस नहीं रह जाता है । इस शरीर को एक अलग अस्तित्व के रूप में ग्रहण
करना अहंकार है । इसे ब्रम्ह के एक सूक्ष्म अंश के रूप में ब्रम्ह के प्रतिनिधि के
रूप में ग्रहण करना ब्रम्ह में विलय है । सत्य स्वरूप है ।
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