गुरुवार, 4 सितंबर 2014

अहंकार मात्र भ्रम

यह समस्त सृष्टि ब्रम्ह की अभिव्यक्ति है । ब्रम्ह ही सृजन कर्ता है । ब्रम्ह ही समस्त गतिविधियों का संचालक है । इसके विपरीत स्व का विचार मात्र एक भ्रम ही होता है । स्व का अस्तित्व तथा स्व का विचार मात्र सत्य के विपरीत संघर्ष है । इस सत्य का बोध एवं सत्य के अनुरूप स्व का ब्रम्ह में समर्पण ही अभीष्ट उपलब्धि होती है । इस उपलब्धि के उपरांत कुछ भी हासिल करना शेस नहीं रह जाता है । इस शरीर को एक अलग अस्तित्व के रूप में ग्रहण करना अहंकार है । इसे ब्रम्ह के एक सूक्ष्म अंश के रूप में ब्रम्ह के प्रतिनिधि के रूप में ग्रहण करना ब्रम्ह में विलय है । सत्य स्वरूप है । 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें