प्रकृति के तीन गुण । तमस, रजस, सात्विक । तीनो ही बंधन प्रशस्थ करने वाले हैं । एक कर्म के परिणाम से सृजित
होने वाला दूसरा कर्म । बंधन । होना क्या चाहिये ? मुक्ति । एक कर्म किया । वह वहीं
पूर्ण । मुक्ति । यह समस्त आत्मा की यथा स्थिति के फल द्वारा उत्पन्न होने वाली
स्थितियाँ हैं । मोंहाशक्त आत्मा प्रेरित करेगी बंधनकारी कर्म । मोंह से मुक्त
आत्मा प्रेरित करेगी मुक्ति दायक कर्म । आत्मा की मुक्त स्थिति पाने के लिये एक
प्रारम्भिक प्रयत्न के रूप में मनुष्य को अपने अंदर विद्यमान तमस् और रज़स को
सात्विक के द्वारा विजय करना चाहिये । यह सात्विक स्थिति भी बंधनकारी है । मात्र
तमस् और रज़स की तुलना में बेहतर है । इसलिये तमस् और रज़स के नियंत्रण के उपरांत
इसे भी त्यागना होगा । स्वतंत्र आत्मा से ब्रम्ह की ओर अग्रसर हो सकेंगे ।
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