आत्मा जब अपने को प्रकृति के साथ
चिन्हित करती है तो वह बंधन में है । जब आत्मा अपने को प्रकृति से अछूता रखती है
तो वह मुक्त है । बंधन इच्छाओं का संसार है । मुक्ति स्वतंत्रता का संसार है ।
यद्यपि कि आत्मा और प्रकृति पूर्णरूप से भिन्न घटक हैं फिरभी साथ संसर्ग में रहकर
एक दूसरे को प्रभावित करते हैं । ईंद्रीय वासनाओं के भोग की कामना । प्रकृतीय घटको
के स्वामित्व की कामना । यह सब इच्छालोक है । जो प्रकृति करावे वह करना, जो कुछ प्रकृति दे उसमें संतुष्ट रहना स्वतंत्रता का लोक है ।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें