हम प्रत्येक के अंत:करण में
परमात्मा विद्यमान हैं । यह माया का प्रभाव है कि हम सभी प्रकृतीय मोंह में कुछ इस
प्रकार तल्लीन हैं कि हम उस परमात्मा की उपस्थिति को अनुभव नहीं कर पाते हैं । हमारे
अंदर विद्यमान परमात्मा हमारे प्रत्येक कर्म सम्पादन का साक्षात् साक्षी है ।
इन्ही बंधनकारी कर्मो के कारण ही हम इस शरीर उस शरीर में जन्म पाते दु:ख संताप
झेलते सतत् यात्रा करते चले जा रहे हैं । जिसपल हमें अपनी इच्छाजनित कर्मों को
करने की भूल समझ में आ जाती है और हम प्रकृति के आदेशित कर्मों को करने के पथ पर
चल पडते हैं तो हमारा उत्तरोत्तर सुधार प्रारम्भ हो जाता है । चर्मोत्कर्ष स्थिति
होती है कि हम प्रत्येक पल अपने अंदर विद्यमान परमात्मा की अनुभूति में जीवन जीयें
। इसका फल यह होगा कि परमात्मा हमारी शुचिता से संतुष्ट होकर हमें अपने में समाहित
कर लेगा ।
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